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दिल्ली हाई कोर्ट ने क्यों खारिज कर दी पूर्व कर्नल की याचिका, यहां पढ़ें पूरी जानकारी

Delhi High Court

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक पूर्व सैन्य अधिकारी की याचिका खारिज करते हुए हिदायत दी है कि वो अपनी बेटी की जिंदगी में दखल न दे। जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस रनजनीश भटनागर की पीठ के समक्ष पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल याचिका दाखिल की थी कि उसके दामाद ने किसी अन्य महिला से शादी कर ली है इसलिए उसकी अपनी बेटी की शादी को अवैध घोषित किया जा सके और वो अपने पसंद के व्यक्ति से बेटी की पुनः शादी करवा सके।

दरअसल, कर्नल की बेटी ने अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी की थी और इस शादी से दंपति को एक बेटा भी है। कर्नल चाहते थे कि कोर्ट में यह साबित कर दिया जाए कि उनकी बेटी ने जिस व्यक्ति से शादी की है वो पहले से शादीसुदा है इसलिए उसकी बेटी की शादी अवैध घोषित की जाए।

जस्टिस संजीव सचदेवा और रजनीश भटनागर की पीठ ने कहा कि कर्नल को किसी तीसरे पक्ष के विवाह में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।

बेंच ने कहा है कि याचिका दाखिल करने के समय और बेटी के बयान से पता चलता है कि अपीलकर्ता की असली शिकायत यह है कि उनकी बेटी ने उनकी मर्जी के खिलाफ शादी की है। बेंच ने कहा है कि फैमिली कोर्ट ने इस बात पर गौर किया है कि अपीलकर्ता की बेटी ने अपने पति के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की है या शिकायत करने के लिए आगे नहीं आ रही है, ऐसे में अपीलकर्ता के पास तीसरे पक्ष के विवाह के लिए घोषणा की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बहाल रखते हुए कहा है कि अपीलकर्ता यानी पिता को अपनी बेटी-दामाद के वैवाहिक जीवन को तहस-नहस करने की अनुमति नहीं दे सकते, खासकर तब जब उनका एक बेटा भी है।

इससे पहले, कर्नल ने फैमिली कोर्ट में परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा-7 (1) (बी) के तहत याचिका दाखिल की थी। इस याचिका में कर्नल ने कोर्ट से याचना की थी कि उसकी बेटी ने जिस व्यक्ति से शादी की है वो पहले से शादीशुदा था और उसकी बेटी को इस बारे में जानकारी नहीं थी। यह शादी 28 अगस्त, 2016 को हुई थी। कर्नल चाहते थे कि कोर्ट इसी तर्क के आधार पर अपनी बेटी की उस व्यक्ति के साथ हुई शादी को अवैध घोषित कर दे। ताकि वो अपनी बेटी की शादी किसी अन्य शख्स से कर सकें। यहां खास बात यह कि कर्नल की बेटी ने अपने पति के खिलाफ न्यायालय में कोई शिकायत नहीं की थी। वो पिता की याचिका पर साक्ष्य देने के लिए भी नहीं आई।

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About the Author: Ashish Sinha

-Ashish Kumar Sinha -Editor Legally Speaking -Ram Nath Goenka awardee - 14 Years of Experience in Media - Covering Courts Since 2008

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