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आबकारी नीति मामले में CBI ने मनीष सिसोदिया को किया गिरफ्तार, पढ़े पूरी ख़बर

सीबीआई ने दिल्ली की आबकारी नीति में कथित रूप से भ्रष्टाचार के मामले में उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को आखिरकार रविवार की शाम को गिरफ्तार कर लिया। सीबीआई सिसोदिया को सोमवार को दोपहर में दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट में पेश करेंगी। सीबीआई के सूत्रों के मुताबिक सीबीआई दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की रिमांड की मांग कर करेगी। सीबीआई ने इस मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी है। सूत्रों ने लीगली स्पकिंग को बताया है की एजेंसी मामले में पहला पूरक आरोपपत्र दाखिल करने के लिए तैयार है।

सीबीआई की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि सीबीआई ने जीएनसीटीडी की आबकारी नीति के निर्माण और कार्यान्वयन में कथित अनियमितताओं से संबंधित एक मामले की चल रही जांच में दिल्ली के उप मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने कहा कि साल 2021-22 के लिए आबकारी नीति के निर्माण और कार्यान्वयन में कथित अनियमितताओं के मामले की जांच के लिए उपमुख्यमंत्री और प्रभारी आबकारी मंत्री, दिल्ली के जीएनसीटीडी और 14 अन्य के खिलाफ तत्काल मामला दर्ज किया गया था। इसमें कुछ निजी लोगों को टेंडर के बाद के फायदा पहुंचाया गया था।

सीबीआई के मुताबिक मुंबई की एक निजी कंपनी के तत्कालीन सीईओ और 6 अन्य के खिलाफ 25 दिसम्बर 2022 को आरोप पत्र दाखिल किया गया है। जांच एजेंसी के मुताबिक डिप्टी सीएम को 19 फरवरी को जांच में शामिल होने लेने के लिए सीआरपीसी की धारा 41ए के तहत नोटिस जारी किया गया था। हालांकि उन्होंने व्यस्तता का हवाला देते हुए एक सप्ताह का समय मांगा। उनके अनुरोध को स्वीकार करते हुए, उन्हें रविवार को जांच में भाग लेने के लिए सीआरपीसी की धारा 41ए के तहत एक नोटिस जारी किया गया था।

इसमें पिछले साल 17 अक्टूबर को पूछताछ के दौरान उनके टाले गए अलग अलग प्रश्नों और उनकी भूमिका आधारित संबंधित सवाल थे। मामले की जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों के आधार पर पूछताछ की गई। हालांकि, सीबीआई का मानना है कि उन्होंने टालमटोल भरे जवाब दिए। इसके विपरीत सबूतों का सामना किए जाने के बावजूद जांच में सहयोग नहीं किया। इसलिए उसे गिरफ्तार किया गया है।

सीबीआई के सूत्रों के मुताबिक सिसोदिया के खिलाफ सबूतों को मिटाने के अलावा आईपीसी की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश की सजा) और 477ए (खातों में हेरफेर) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 सहित (भ्रष्ट या अवैध तरीकों से या किसी लोक सेवक को प्रभावित करने के लिए अनुचित लाभ उठाना) के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था। 

*दिल्ली सरकार की नई आबकारी नीति क्या थी।

दिल्ली सरकार ने नई आबकारी नीति 2021-22 पेश की थी। सरकार के मुताबिक इस नई नीति के जरिए शराब खरीदने का नया अनुभव लोगों को देना चाहती थी। नई नीति में होटलों के बार, क्‍लब्‍स और रेस्‍टोरेंट्स को रात 3 बजे तक ओपन रखने की छूट दी गई थी। इसमें छत समेत खुली जगह पर भी जगह शराब परोसने की अनुमति दी गई थी। हालांकि इससे पहले तक, खुले में शराब परोसने पर रोक थी। बार में किसी भी तरह के मनोरंजन का इंतजाम करने का भी प्रावधान था। इसके अलावा बार काउंटर पर खुल चुकीं बोतलों की शेल्‍फ लाइफ पर कोई पाबंदी नहीं रखी गई थी। नई पॉलिसी के तहत किसी भी शराब की दुकान पर सरकार का मालिकाना हक नहीं रखने का प्रावधान था। नई पॉलिसी में ग्राहक की पसंद और ब्रैंड्स की उपलब्‍धता को तवज्जो दी गई थी। इसका उद्देश्य स्‍मगलिंग और बूटलेगिंग रोकना था। नई पॉलिसी में सबसे खास बात थी कि ई-टेंडरिंग के जरिए हर जोन ऑपरेटर के लिए नया L-7Z लाइसेंस अलॉट किया जाना था।

  • आबकारी नई नीति पर क्यों उठे थे सवाल?

दरसअल नई नीति दिल्ली को 32 जोन में बांटती थी। इसके अनुसार मार्केट में केवल 16 प्लेयर्स को इजाजत दी जा सकती है। इससे उन्हें एकाधिकार मिलने की बात थी। विपक्षी दलों का आरोप था कि नई आबकारी नीति के जरिए केजरीवाल सरकार ने करोड़ों रुपये का भ्रष्‍टाचार किया था।
इतना ही नही दिल्‍ली में शराब के कई छोटे वेंडर्स दुकानें बंद कर चुके थे। उनका कहना था कि कुछ बड़े प्‍लेयर्स अपने यहां स्‍टोर्स पर भारी डिस्‍काउंट से लेकर ऑफर्स दे रहे हैं। ऐसे में इससे उनके लिए बिजनेस कर पाना नामुमकिन हो गया। नई पॉलिसी को कोर्ट में भी चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया कि नई पॉलिसी अवैध, अनुचित और मनमानी है। यह दिल्ली आबकारी अधिनियम-2009 का उल्लंघन करती है। साथ ही दिल्ली सरकार के 28 जून के ई-टेंडर नोटिस को भी रद्द करने की मांग की गई थी। इसमें शराब के रिटेल विक्रेताओं को 32 जोनल लाइसेंस देने के लिए जोन वाइज इलेक्ट्रॉनिक बोलियां मंगाने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तय की गई थी। वहीं, विपक्षी पार्टी बीजेपी का कहना था कि टेंडर की शर्तों के हिसाब से कॉर्टल यानी दो-तीन कंपनियों को एक करने की परमिशन नहीं थी। बीजेपी का आरोप था कि दस्तावेज के मुताबिक कार्टल हुआ है। टेंडर के हिसाब से ब्लैक लिस्टेड कंपनी को अनुमति नहीं थी, लेकिन दिल्ली में एक कंपनी को दो जोन डिस्ट्रीब्यूशन के लिए दिए गए। तीसरा रिटेल सेक्टर में मैन्युफेक्चरिंग कंपनी को परमिशन नहीं थी। मगर, इन निर्माता कंपनियों को दो जोन दिए। इसके दस्तावेज आबकारी विभाग को भी दिए थे।

*दिल्ली सरकार की दलील

इस मामले में दिल्ली सरकार का कहना था कि नई आबकारी नीति 2021-22 का मकसद भ्रष्टाचार कम करना और शराब व्यापार में उचित प्रतिस्पर्धा का अवसर मुहैया कराना है। सरकार ने कहा कि नीति के खिलाफ सभी आशंकाएं काल्पनिक हैं साथ ही नई पॉलिसी से दिल्ली में शराब माफिया और कालाबाजारी खत्म होगी। दिल्ली सरकार का राजस्व बढ़ेगा। शराब खरीदने वालों की शिकायत भी दूर होगी। इसके अलावा हर वार्ड में शराब की दुकानें एकसमान होंगी। वहीं, एलजी के आदेश के बाद सीबीआई ने दिल्ली सरकार की आबकारी नीति 2021-22 के कार्यान्वयन में कथित अनियमितताओं के संबंध में प्राथमिकी दर्ज की थी। प्राथमिकी में नामजद 15 व्यक्तियों और संस्थाओं में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी शामिल थे। 

  • चीफ सेक्रेटरी की वो रिपोर्ट जिसके बाद करवाई हुई।

नई एक्साइज पॉलिसी को लेकर चीफ सेक्रेटरी की तरफ से दिल्ली के उपराज्यपाल को रिपोर्ट भेजी गई। रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि पहली नजर में यह जाहिर होता है कि नई एक्साइज पॉलिसी को लागू करने में जीएनसीटी एक्ट-1991, ट्रांजेक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स 1993, दिल्ली एक्साइज एक्ट 2009 और दिल्ली एक्साइज रूल्स 2010 का उल्लंघन किया गया है। इतना ही नही टेंडर जारी होने के बाद 2021-22 में लाइसेंस हासिल करने वालों को कई तरह के गैरवाजिब लाभ पहुंचाने के लिए भी जानबूझकर बड़े पैमाने पर तय प्रक्रियाओं का उल्लंघन भी किया गया है।इसके अलावा शराब विक्रेताओं की लाइसेंस फीस भी माफ की गई, जिससे सरकार को लगभग 144 करोड़ रुपये के रेवेन्यू का नुकसान हुआ। रिपोर्ट में आबकारी मंत्री की जिम्मेदारी भी निभा रहे उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने वैधानिक प्रावधानों और आबकारी नीति का उल्लंघन किया। उपराज्यपाल के ऑफिस की तरफ से यह भी स्पष्ट किया गया है कि ट्रांजेक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स 1993 के रूल नंबर 57 के तहत चीफ सेक्रेटरी ने यह रिपोर्ट एलजी को भेजी थी।

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About the Author: Meera Verma

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